Saturday, November 29, 2008

मुंबई धमाके

इक् तरह की खीज हो रही है इतना बड़ा हमला हो गया और हमे भनक तक नही थी
अब उस पर राजनीती होगी चर्चा होगी और कुछ दिन बाद सब शांत
इसे क्या कहे .....कोई भी आए और हम पर सवार हो जाए
क्या यह समय कड़े कदम उठाने का नही है ? हम कब तक और क्यों चुप रहते है?

Monday, November 24, 2008

किरायदार

मांसी की बहुत इछा थी
की हो उसका भी अपना घर
पूरी उम्र गुजार दी उसने
फिर इक दिन
हुआ उसका भी घर
पर तब
गुजर बसर करने के लिए उम्र ही नही बची थी उसके पास

Thursday, November 20, 2008

फिर शुरू हो गई स्वप्न्यात्रा
कहते हुए
सपनो का कुछ सच नही होता
सपनो में कुछ सच नही होता
इक और दिन ढूलक गया आँख से
अब आँखे सपने नही
राते गिना करती है

संदेह

मै विश्वास करू
ठोकर खाऊ
हार जाऊ
इससे बेहतर है
मै करू संदेह

लम्बी फेहरिस्त थी

आज के दिन के कामो की

उधर इक कविता घूम रही थी दिमाग में

हो जाय ऐसा

शायद कोई चमत्कार हो जाय
बाती और माटी के बीच
बिना तेल के बन जाय
आग का रिश्ता
फिर तेल बना रहे विवादों में
आलू प्याज दाल दलहन
सबकी किल्लत हो जाय
पर चकमक के पत्थर के दिनों की याद में
बहती नदियों और हरे पेडो की याद में जल उठे उम्मीद का दिया
शायद हो जाय ऐसा

खुशी

जो मै दिखाऊ की बहुत खुश हूँ तो इसका मतलब नही की सच में खूब खुश हूँ

पर यदि

चोडी हँसी न हंस पाऊ तब भी उसका मतलब ये नही की खुश नही हुई

जरा भी तुमसे मिलकर

Wednesday, November 19, 2008

जुगत

उसके हाथो को मेहंदी से रंगा जाता रहा
बचपन से हर तीज त्यौहार पर
उसकी समझ आने से
चीजे समझ से परे हो जाने तक यह सिलसिला बना रहा
बहुत बाद में वह जान पाई की यह तो इक साजिश थी
ताकि न वो कभी अपनी लकीरे देखे न उन्हें सच में बदलने की जुगत कर पाये
अब वह भी बन चुकी है इसी साजिश का हिस्सा
उसकी बेटी और बेटी की बेटी को सुघा चुकी है मेहंदी की खुशबू
उसी ने बना दिया है उन्हें भी अचेत
पर देर नही हुई की कुछ भी न हो सके
उसे किसी तरह चुरा लेनी है मेहंदी की गंध और उसका रंग भी
तो निकल सकती है बेतिया इस तिलिस्म से बाहर
सच अभी इतनी भी देर नही हुई