kahana hai kuch aur
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मुंबई धमाके
किरायदार
फिर शुरू हो गई स्वप्न्यात्राकहते हुएसपनो का कुछ सच...
इक और दिन ढूलक गया आँख सेअब आँखे सपने नहीराते गिना...
संदेह
लम्बी फेहरिस्त थी आज के दिन के कामो की उधर इक कवित...
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स्वरांगी साने Swaraangi Sane
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Monday, November 24, 2008
किरायदार
मांसी की बहुत इछा थी
की हो उसका भी अपना घर
पूरी उम्र गुजार दी उसने
फिर इक दिन
हुआ उसका भी घर
पर तब
गुजर बसर करने के लिए उम्र ही नही बची थी उसके पास
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