उसके हाथो को मेहंदी से रंगा जाता रहा
बचपन से हर तीज त्यौहार पर
उसकी समझ आने से
चीजे समझ से परे हो जाने तक यह सिलसिला बना रहा
बहुत बाद में वह जान पाई की यह तो इक साजिश थी
ताकि न वो कभी अपनी लकीरे देखे न उन्हें सच में बदलने की जुगत कर पाये
अब वह भी बन चुकी है इसी साजिश का हिस्सा
उसकी बेटी और बेटी की बेटी को सुघा चुकी है मेहंदी की खुशबू
उसी ने बना दिया है उन्हें भी अचेत
पर देर नही हुई की कुछ भी न हो सके
उसे किसी तरह चुरा लेनी है मेहंदी की गंध और उसका रंग भी
तो निकल सकती है बेतिया इस तिलिस्म से बाहर
सच अभी इतनी भी देर नही हुई
Wednesday, November 19, 2008
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1 comment:
मर्मस्पर्शी भावाभिव्यक्ति.
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