Wednesday, November 19, 2008

जुगत

उसके हाथो को मेहंदी से रंगा जाता रहा
बचपन से हर तीज त्यौहार पर
उसकी समझ आने से
चीजे समझ से परे हो जाने तक यह सिलसिला बना रहा
बहुत बाद में वह जान पाई की यह तो इक साजिश थी
ताकि न वो कभी अपनी लकीरे देखे न उन्हें सच में बदलने की जुगत कर पाये
अब वह भी बन चुकी है इसी साजिश का हिस्सा
उसकी बेटी और बेटी की बेटी को सुघा चुकी है मेहंदी की खुशबू
उसी ने बना दिया है उन्हें भी अचेत
पर देर नही हुई की कुछ भी न हो सके
उसे किसी तरह चुरा लेनी है मेहंदी की गंध और उसका रंग भी
तो निकल सकती है बेतिया इस तिलिस्म से बाहर
सच अभी इतनी भी देर नही हुई

1 comment:

संजय पटेल said...

मर्मस्पर्शी भावाभिव्यक्ति.